धरमजयगढ़ वन मंडल की कर्मकांड रूकने का नाम नही ले रहा हैं, आरक्षित वन एएनआर कार्य में जेसीबी ट्रेंच नाली की कर दी खुदवाई!
रायपुर / छत्तीसगढ़ के राजवाड़े गढ़ जिसे धरमजयगढ़ के नाम से जाना जाता है, यहां पर वन विभाग में बड़ा गजब का खेला लंबे समय से चल रहा है। चाहें लकड़ी का हेरा फेरी मामला हो, या मरे हुए व्यक्ति के नाम से रोजगार गारंटी में हाजरी चढ़ाने का हो या फिर निलामी के समय रंगे हांथों पकड़े जाने की मामला हो अभी तो वन संरक्षण के नाम पर बनाये जा रहे ट्रेंच नाली में धांधली किया जा रहा है। येसे कार्यों को मजदुरों से करवाने के बजाय जेसीबी से कराया जा रहा है।
दरअसल मामला धरमजयगढ़ वन मंडल के अंतर्गत छाल वन परिक्षेत्र का है जहाँ पर आरक्षित वन कक्ष क्रमांक 562 में चल रहा एएनआर (सहायक प्राकृतिक पुनर्जनन) वृक्षारोपण कार्य विवादों में घिर गया है। जानकारी के अनुसार, एएनआर योजना के तहत बनाए जा रहे कंटूर ट्रेंच नाली (सीपीटी) का निर्माण श्रमिकों के माध्यम से कराये जाने के बजाय जेसीबी जैसी भारी मशीनों से कराया जा रहा है। मजदुरों के हक को छिनते हुए वन विभाग के अधिकारी अपने जेब भरने के लिए जेसीबी से काम चला रहे हैं।
जबकि एएनआर योजना का मूल उद्देश्य प्राकृतिक रूप से उगने वाले पौधों का संरक्षण, वर्षा के जल का संचयन संरक्षण और करना स्थानीय ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराना होता है।
स्थानीय ग्रामीणों के हक में डांका डालकर अपने जेब गरम करने के उद्देश्य से जेसीबी से लगातार कार्य चल रहा है। इससे न केवल मजदूरों के हाथों से काम छिनने की आशंका है, बल्कि योजना की आत्मा भी प्रभावित हो रही है।

यदि स्वीकृत प्राक्कलन और तकनीकी स्वीकृति में मशीन उपयोग का कोई उल्लेख नहीं है, तो यह सीधे-सीधे वित्तीय अनुशासन और प्रक्रियागत नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आता है। और वहीं ग्रामीणों का कहना है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए है। आगे उनका कहना है कि यदि एएनआर जैसी संवेदनशील योजना में भी नियमों की अनदेखी होगी, तो वन संरक्षण और ग्रामीण रोजगार दोनों ही उद्देश्यों पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा।
अब देखना यह है कि विभागीय अधिकारी इस पर क्या रुख अपनाते हैं—क्या मशीनों के उपयोग को वैध ठहराया जाएगा या फिर जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी। फिलहाल, आरक्षित वन कक्ष 562 में उठे इस विवाद ने वन अमले की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

