छत्तीसगढ़ सरकार की हो रही है कीर कीरी, न्यूनतम वेतन बढ़ोतरी के नाम से श्रमिकों के मुंह में तमाचा, श्रम मंत्री की चुप्पी सवालों के घेरे में…
रायपुर / छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, श्रमिक लोग बड़े ही उम्मीद के सांथ भारतीय जनता पार्टी का सरकार बनाने में अपनी अहम भूमिका निभाई है।
छत्तीसगढ़ में श्रम मंत्री के विभाग से जारी हुआ आदेश न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 में इस बार जीरों रूपया बढ़ोतरी कर श्रमिकों के मुह में तमाचा मारा है। छत्तीसगढ़ के इतिहास में यह पहली बार येसा न्यूनतम वेतन का बढ़ोत्तरी किया गया है जो, श्रमिकों के मुह में सीधा तमाचा है। पूर्व में भी यही भारतीय जनता पार्टी का सरकार था जब मुख्य मंत्री डा.रमन सिंह जी थे और श्रम मंत्री भैय्या लाल राजवाड़े था तक बढ़े हुए वेतन को अचानक से कम कर दिया गया था! उस समय जब श्रमिकों ने विरोध किया तो मुख्य मंत्री और श्रम मंत्री का दो टुक में जवाब था कि कारखाना वालों ने विरोध किया जिसके कारण हमें बढ़े हुए दर को कम करना पड़ा।


हर 05 वर्षों में होता है मूल वेतन में बढ़ोतरी लेकिन 10 वर्ष बित गया है नही हुआ बढ़ा मूल वेतन
न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत हर पांच साल में मूल वेतन की बढ़ोतरी किया जाता है किन्तु आप पुरे दस वर्ष बित चुके है किसी भी प्रकार की मूल वेतन में बढ़ोतरी नही किया गया है जिसके कारण से सरकार की कार्यशैली को लेकर श्रमिकों में काफी नाराजगी देखने को मिल रहे हैं।
जब केन्द्र सरकार वेतन बढ़ाता था तो राज्य सरकार अपनी अधिकार क्षेत्र व राजकीय कोष की बाते करके दरकिनार कर देते थे किन्तु वही राज्य सरकार आज केन्द्र की गणना का हवाला देते हुए 0 रूपया बढ़ोतरी किया है।
पूर्व में जब लगभग 45 रूपया बढ़ा था सरकार जगह जगह बेनर पोस्टर लगवाये थे बड़े बड़े न्यूज पेपरों में व टीवी चैनलों में एड आया था कि न्यूूनतम वेतन में बढ़ोतरी किया गया है।
आज राज्य सरकार अक्टूबर 2025 में जारी किये हुए न्यूनतम वेतन पर पेपर में प्रकाशन कराते हुए जगह जगह होर्डिंग लगवाना चाहिये।

श्रमिकों के सांथ धोखा, छत्तीसगढ़ की सरकार व श्रम मंत्री इस न्यूनतम वेतन मामले पर पूनर्विचार करें, और अपनी सरकार की साथ को बचाने के लिये पुनर्रिक्षीत दर पर संसोधन करें।
विधायकों एवं सांसदों के वेतन बढ़ोतरी एक मत में पास
जब विधायक और सांसद का वेतन बढ़ोतरी किया जाना रहता है तो एक मत में एक स्वर में निर्णय पारित कर दिया जाता है! श्रमिकों की बात आती है कानूनी अड़चनें सामने आ जाते है, क्या यही न्याय है, जिस हिसाब से मंहगाई चरम सीमा पर है उस हिसाब से दैनिक वेतनभोगी श्रमिकों का वेतन नही के बराबर है, न मर सकते है न मोटा सकते हैं।
राज्य सरकार के पूर्व कलेक्टर व वित्त मंत्री जो सरकार को चलाने में अपनी अहम भूमिका निभा रहे है,लेकिन जिस परिस्थिति में आज सरकार को खड़ा किये हुए है,उससे येसा लग रहा है आने वाले समय में दुरगामी परिणाम का सामना करना पड़ेगा।
पूर्वर्तीय सरकार ने जैसे दैनिक वेतनभोगी श्रमिकों को सताया तरसाया और शासन सत्ता से बेदखल हो गया,ठीक उसी प्रकार वर्तमान सरकार की परिस्थिति दिख रही हैं।
शासकीय विभागों,प्राइवेट संस्थानों एवं कारखानों में कार्यरत श्रमिकों का घुस्सा देखने को मिल रहा है,और कोष रहा है कि यही विकसीत भारत का संकल्प लेने वाले सरकार की हाल,,बात 2047 की करते है किसने देखा है 2047 पर आज जरूर 2025 देखने को मिल रहा है जो श्रमिकों के निवाला का अंश छिन लिया है।

