धरमजयगढ़ में अवैध कब्जा-बिक्री का खेल जारी, भूमि पर भू-माफियाओं द्वारा षडयंत्र पूर्वक किया जा रहा है गोरखधंधा
रायपुर / छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में धरमजयगढ़ तहसील में भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान विस्थापित परिवारों को आवंटित पुनर्वास भूमि पर अवैध क्रय-विक्रय और डायवर्सन का मामला सामने आया है।
स्थानीय निवासियों के अनुसार, भू-माफिया सत्ता पक्ष के लोगों के साथ मिलकर ,इन भूमियों को छोटे-छोटे प्लॉटों में बांटकर ऊंची कीमतों पर बेच रहे हैं, जिससे नगर पालिका अधिनियम की धारा 339 का उल्लंघन हो रहा है।
प्रभावितों ने इस मामले की जांच कर अवैध लेन-देन को शून्य घोषित करने और दोषियों पर कानूनी कार्रवाई की मांग की है। बताया जा रहा है कि 1960 से 1980 के बीच भारत सरकार ने विभाजन प्रभावित 642 परिवारों को धर्मजयगढ़ तहसील के तीन ग्रामों में बसाया था। इन परिवारों को जीवनयापन के लिए शुरुआत में 7 एकड़ और बाद में 5 एकड़ भूमि आवंटित की गई।

वर्ष 2014 में राज्य सरकार के आपदा विभाग, मंत्रालय रायपुर के आदेश पर इन भूमियों पर स्वामित्व अधिकार प्रदान किए गए। हालांकि, अब इन भूमियों का बिना जिला कलेक्टर की अनुमति के क्रय-विक्रय, डायवर्सन और बी-1 में नाम चढ़ाना हो रहा है। विशेष रूप से, राजस्व ग्राम धर्मजयगढ़ कॉलोनी (पी.एच. नंबर 33) और बायसी कॉलोनी (पी.एच. नंबर 36) में कई मामलों में अवैध लेन-देन सामने आए हैं। एक प्रमुख उदाहरण खसरा नंबर 391 (रकबा 2.833 हेक्टेयर) का है, जो वार्ड-8 क्षेत्र में स्थित है। इस भूमि को पहले तीन भागों में विभाजित किया गया 391/1, 391/2 और 391/31 सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों ने 391/3 को 21 दिसंबर 2023 को अपने नाम रजिस्ट्री करवाकर एक एकड़ 70 डिसमिल और डेढ़ एकड़ का पट्टा बनवा लिया। इसके बाद इसे छोटे-छोटे प्लॉटों (5-10 डिसमिल) में बांटकर 18 दिसंबर 2024 से 8 मई 2025 तक 20 से अधिक लोगों को गुमराह कर ऊंची कीमतों पर बेचा गया। नामांतरण की कार्यवाही 2024-25-176-1-813 और 2025-26-176-1-78 के तहत पूरी की गई। इसी तरह, 391/1 को 20 मार्च 2023 को किसी अन्य व्यक्ति द्वारा रजिस्ट्री करवाया गया, लेकिन इसमें भू-अर्जन अंकित होने के कारण नामांतरण निरस्त कर दिया गया। प्रभावितों का कहना है कि एक ही खसरा में भू-अर्जन अंकित होने पर दूसरे या तीसरे भाग में नामांतरण नहीं होना चाहिए, लेकिन यहां नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं।

पुनर्वास भूमि, वन भूमि और सिंह देव भूमि का बिना कलेक्टर की अनुमति के रजिस्ट्री, दान, वसीयत या बिक्री नहीं हो सकती, फिर भी भू-माफिया पहले अपने नाम रजिस्ट्रीक रवाकर छोटे टुकड़ों में बेच रहे हैं। इनके पास आरईआरए (ऋश्वन) पंजीयन भी नहीं है, जो नगर पालिका अधिनियम 1961 की धारा 339 का स्पष्ट उल्लंघन है।

स्थानीय निवासियों ने बताया कि इस तरह के अवैध कार्यों से मूल विस्थापित परिवारों के अधिकारों का हनन हो रहा है। एक प्रभावित ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ये भूमि हमारे पूर्वजों को जीवनयापन के लिए दी गई थी, लेकिन अब माफिया इसे प्लॉटिंग कर बेच रहे हैं। एक भाग में रजिस्ट्री होने पर नामांतरण हो जाता है, लेकिन दूसरे में नहीं यह सवाल खड़े करता है कि सिस्टम में कहां खामी है? जिला प्रशासन से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यदि शिकायत मिलती है तो जांच की जाएगी। हालांकि, अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। प्रभावितों ने मांग की है कि इन अवैध क्रय-विक्रय, बंटवारे और नामांतरण को जांच के बाद शून्य घोषित किया जाए तथा दोषियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई हो। यह मामला पुनर्वास नीतियों की खामियों को भी उजागर करता है, जहां बिना उचित निगरानी के ऐसी भूमियां आसानी से हथियाई जा रही हैं।


